[21/01 8:45 AM] TOL Deep Sandhu: तीन-तीन शादिया करने वाला आमिर खान
आज समाज सेवी बना है l
औरतो की आजादी की बात
करता है पर अपने मुस्लिम धर्म मे बुर्का प़था पर कुछ
नही बोलता?
क्या यही सत्यमेव जयते है?
सत्यमेव जयते कार्यक्रम के अंत में वो HUMANITY
TRUST को मदद करने की बात करता है मगर ये
ट्रस्ट कौन चलाता है? किस लिये चलाता है? इसका उद्देश
क्या है?आप में से किसी को पता है?
या कभी पता करना चाहा?
चलो इस Huminity Trust के Board of Directors के
कार्यकारी मंडल पे नजर डाले-
1) जगबर अलि
2) हकिम अलि
3) फजलुददीन
4) मोहममद राजा
5) एम्.एस नाझिक
6) ए अहमद इरजाद
7) एस अबदुल बसीतइस
Humanity Trust के उद्देश :-
१) मस्जिदे बनवानी-
उनकी दुरुस्ती-
उनकी देखभाल का कामइत्यादि…
२) मुस्लिम युवाओं को देश विदेश में नौकरी दिलवाना…
(यंहा चेक कर सकते है - www.humanitytrust.com )
देशसेवा की आड़ में देश के ही बहुत
से लोग देशद्रोह करते हैं।
इनका पर्दाफाश करे एवं लोगों को जागरूक करे ।l
media ने कभी ये बताया ??
nestle कंपनी खुद मानती है कि वे अपनी चाकलेट kitkat मे
बछड़े के मांस
का रस
मिलाती है
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media ने कभी ये बताया ???
की मद्रास high cout मे fair and lovely कंपनी पर जब case
किया गया था ! तब कंपनी ने खुद माना था ! हम cream मे
सूअर
की चर्बी का तेल मिलाते है !!
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media ने कभी बताया कि
ये vicks नाम कि दवा यूरोप के कितने देशो मे ban है ! वहाँ इसे
जहर
घोषित किया गया है !पर भारत मे सारा दिन tv पर
इसका विज्ञापन
आता है !!
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media ने कभी बताया ??
कि life bouy न bath soap है न toilet soap ! ये
जानवरो को नहलाने
वाला cabolic soap है !
यूरोप मे life bouy से कुत्ते है !और भारत मे 9 करोड़ लोग इससे
रगड़ रगड़
कर नहाते हैं !!
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media ने कभी बताया ! ???????????
की ये coke pepsi सच मे toilet cleaner है ! और ये साबित
हो गया है
इसमे 21 तरह के अलग अलग जहर है ! और तो और संसद की कंटीन
मे
coke pepsi बेचना ban है ! पर पूरे देश मे बिक रही है !!
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media ने कभी बताया ????
कि ये healt tonic बेचने
वाली विदेशी कंपनिया boost ,complan ,horlics,maltov
a ,protinx ,
इन सबका delhi के all india institute (जहां भारत की सबसे
बड़ी लैब
है ) वहाँ इन सबका test किया गया ! और पता लगा ये सिर्फ
मुगफली के
खली से बनते है ! मतलब मूँगफली का तेल निकालने के बाद
जो उसका waste बचता है !जिसे गाँव मे जानवर खाते है ! उससे
ये health
tonic बनाते है !!
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media ने कभी बताया ??????
अमिताभ बच्चन का जब आपरेशन हुआ था और 10 घंटे चला था !
तब
डाक्टर ने उसकी बड़ी आंत काटकर निकली थी !! और डाक्टर
मे कहा था ये
coke pepsi पीने के कारण सड़ी है ! और अगले ही दिन से
अमिताभ बच्चन
ने इसका विज्ञापन करना बंद कर दिया था और आजतक coke
pepsi
का विज्ञापन नहीं करता नहीं करता !
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Media अगर ईमानदार है !
तो सबका सच एकसाथ दिखाये !!
🔨🔨🔨🔨🔨🔨🔨🔨🔨🔨🔨
आजकल बहुत से लोग हैं
जिन्हें "पिज्जा"
खाने में बड़ा मज़ा आता है .
चलिये पिज्जा पर एक नज़र डालें >>
पिज्जा बेचनेवाली कंपनियाँ
"Pizza Hut, Dominos,
KFC, McDonalds,
Pizza Corner,
Papa John’s Pizza,
California Pizza Kitchen,
Sal’s Pizza"
ये सब कम्पनियॉ अमेरिका की है
आप चाहे तो
Wikipedia पे देख सकते हो.
Note:- पिज्जा मे टेस्ट लाने के लिये
E-631 flavor Enhancer
नाम का तत्व मिलाया जाता है
वो सुअर के मॉस से बनता है
आप चाहो तो Google पे देख लो.
Sahi lage to is msg ko
aage failaye.
● सावधान मित्रों अगर खाने पीने
कि चीजों के पैकेटो पर निम्न कोड
लिखे है तो उसमें ये चीजें मिली हुई है.
E 322 - गाये का मास
E 422 - एल्कोहोल तत्व
E 442 - एल्कोहोल तत्व ओर कमिकल
E 471 - गाय का मास ओर एल्कोहोल तत्व
E 476 - एल्कोहोल तत्व
E 481 - गाय ओर सुर के मास ए संगटक
E 627 - घातक केमिकल
E 472 - गाय + सुर + बकरी के मिक्स मास के संगटक
E 631 - सुर कि चर्बी का तेल
● नोट -
ये सभी कोड आपको ज्यादातर
विदेशी कम्पनी जैेसे :-
चिप्स , बिस्कुट , च्युंगम,
टॉफी ,कुरकुरे ओर मैगी
आदि में दिखेगे l
● ध्यान दे ये अफवह नही
बिलकुल सच है अगर यकीन नही
हो तो इंन्टरनेट गुगल पर सर्च कर लो.
● मैगी के पैक पे ingredient में देखें , flavor (E-635 ) लिखा मिलेगा.
● आप चाहे तो google पर देख
सकते है इन सब नम्बर्स को:-
E100, E110, E120, E140, E141, E153, E210, E213, E214, E216, E234, , E280, E325, E326, E327, E334, E335, E336, E337, E422, E430, E431, E432, E433, E434, E435, E436, E440, E470, E471, E472, E473, E474, E475, E476, E477, E478, E481, E482, E483, E491, E492, E493, E494, E495, E542, E570, E572, E631, E635, E904.
आप सबसे निवेदन है की
चुटकले भेजने की बजाय यह
सन्देश सबक[truncated by WhatsApp]
[21/01 3:46 PM] TOL Dr. Arun: एंटीबॉयोटिक के दुष्प्रभाव।
यदि आपसे यह सवाल पूछा जाए कि एच.आई.वी. और एंटीबॉयोटिक में कौन ज्यादा खतरनाक है तो शायद आप प्रश्नकर्ता की समझ पर हंसें कि कैसा बेवकूफ आदमी है, जो एच.आई.वी. और एंटीबॉयोटिक को एक तराजू पर रख रहा है। जबकि दुनिया जानती है कि एच.आई.वी. संक्रमण होने पर शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है, जिससे बीमार व्यक्ति को छोटी सी बीमारी होने पर भी उसका ठीक होना दूभर हो जाता है। जबकि एंटीबॉयोटिक वे दवाएं हैं, जो हानिकारिक बैक्टीरिया को मारने के लिए रोगी को दी जाती हैं।
लेकिन सच यही है कि भारत में जिस तरह से एंटीबॉयोटिक दवाएं गलत ढ़ंग से ली जा रही हैं, उससे बैक्टीरिया ड्रग रजिस्टेंस हो रहे हैं। और यदि कुछ सालों तक यही हालात रहे तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब बैक्टीरिया पर एंटीबॉयोटिक दवाएं असर करना बंद कर देंगी और तब रोगी के लिए हालात एच.आई.वी. जैसे हो जाएंगे। यह मानना है लखनऊ के तमाम प्रतिष्ठित डॉक्टरों का, जो विश्व स्वास्थ्य दिवस पर दिनांक 07 अप्रैल को लखनऊ में विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित सेमिनारों में अपने विचार प्रकट कर रहे थे।
क्यों ली जाती हैं एंटीबॉयोटिक दवाऍं
आम तौर से बैक्टीरिया से होने वाली तमाम बीमारियों के उपचार में एंटीबॉयोटिक दवाओं का प्रयोग किया जाता है। लेकिन डॉक्टर की फीस बचाने के चक्कर में आदमी कोई भी बीमारी होने पर मेडिकल स्टोर से एंटीबॉयोटिक दवाएं खरीद कर खा लेता है। लेकिन इस चक्कर में अक्सर ये दवाएं या तो ओवर डोज हो जाती हैं, या फिर कम मात्रा में ली जाती हैं, जिससे रोगी को बड़ी मात्रा में इसके दुष्परिणाम झेलने पड़ते हैं। जब बीमारी की गम्भीरता के मुकाबले कम पॉवर की दवाएं ली जाती हैं, अथवा बीमारी ठीक हो जाने पर पूरा कोर्स किये बिना ही दवा बंद कर दी जाती है, तो बैक्टीरिया के कमजोर पड़ जाने के कारण बीमारी तो ठीक हो जाती है, लेकिन बैक्टीरिया पूरी तरह से समाप्त नहीं होते हैं, बल्कि वे धीरे-धीरे उसके प्रति रजिस्टेंस डेवलप कर लेते हैं।
यही कारण है कि 20 साल पहले जो एंटीबॉयोटिक दवाएं फोर्थ जनरेशन के तौर पर प्रयोग में लाई जाती थीं, अब सामान्य बीमारियों में फर्स्ट जनरेशन मानकर दी जाने लगी हैं। इसके दुष्परिणामस्वरूप मच्छर की दवाओं का असरहीन होना तथा टीबी जैसी बीमारी का खतरनाक रूप ले लेना हमारे सामने है। और जब ये दवाएं अधिक पॉवर की ले जाती हैं, तो उनके तमाम तरह के साइड इफेक्ट पैदा हो जाते हैं। परिणामस्वरूप रोगी के शरीर में अन्य खतरनाक बीमारियां जन्म ले लेती हैं।
घातक हो सकता है बिना डॉक्टरी परामर्श के दवा लेना
डॉक्टरों का मानना है कि आमतौर से 70 प्रतिशत मरीज ऐसे होते हैं, जो दवाओं के साइड इफेक्ट की वजह से बीमार होते हैं। ऐसा सिर्फ एंटीबॉयोटिक दवाओं के कारण ही नहीं होता, बल्कि अन्य तमाम एलोपैथिक दवाओं के कारण भी यही होता है। इसके पीछे मुख्य वजह है कि लोगों द्वारा बिना डॉक्टरी सलाह के दवा लेकर खा लेने की प्रवृत्ति। देखने में आता है कि लोग बदनदर्द होने पर ब्रूफेन, सर्दी होने पर सीट्रिजिन, खांसी होने पर कोई भी कफ सीरप, नींद न आने पर एल्प्राजोल, पेटदर्द होने पर मेट्रोजिल आदि दवाएं ले लेते हैं। जबकि लोगों को पता नहीं होता है कि इन दवाओं के साइड इफेक्ट भी होते हैं। और गलत ढंग से लिये जाने पर ये फायदा के स्थान पर नुकसान ज्यादा करती हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि ब्रुफेन शरीर मे दर्द होने पर ली जाने वाली सबसे कॉमन दवा है। जबकि इसकी वजह से गैस्ट्राइटिस हो सकती है तथा किडनी तथा लिवर फेल्योर हो सकता है। इसी प्रकार मेट्रोजिल के लम्बे समय तक इस्तेमाल से कैंसर तथा पेरीफेरल न्यूरोपैथी (नसों की समस्या), एल्प्राजोल से शरीर खोखला, आत्महत्या के विचार आना, निमुसलाइड से लिवर तथा किडनी फेल्योर होना, डिस्प्रिन से गैस्ट्राइटिस, किडनी फेल्योर, स्टेरायड से मांसपेशी व हड्डी की कमजोरी, संक्रमण की आशंका तथा सीट्रीजिन-एविल से निद्रा व सुस्ती के प्रभाव देखने को मिलते हैं।
ऐसे में हमें क्या करना चाहिए
जाहिर सी बात है कि एंटीबॉयोटिक ही नहीं यदि कोई भी दवा सही तरीके से इस्तेमाल न की जाए, तो उससे फायदा की तुलना में नुकसान ज्यादा होता है। इसलिए इस बात को गांठ बांध लें कि बिना डॉक्टरी सलाह के कोई भी दवा (यहां तक कि विटामिन और मल्टीविटामिन्स भी) न लें और डॉक्टर द्वारा किसी भी दवा का जितना कोर्स बताया जाए, उसे पूरा अवश्य करें। और हां, सिर्फ एलोपैथी पर ही निर्भरता न रखें। यदि बीमारी बहुत ज्यादा गम्भीर न हो तो इलाज की अन्य विधियों (आयुर्वेद, नेचुरोपैथी, होम्योपैथी) का भी प्रयोग करे
[21/01 5:42 PM] +91 94251 91857: कहते है -
शब्दों के दांत नहीं होते है
लेकिन शब्द जब काटते है
तो दर्द बहुत होता है और कभी कभी
घाव इतने गहरे हो जाते है की
जीवन समाप्त हो जाता है
परन्तु घाव नहीं भरते.............
इसलिए जीवन में जब भी बोलो मीठा बोलो मधुर बोलों
'शब्द' 'शब्द' सब कोई कहे,
'शब्द' के हाथ न पांव;
एक 'शब्द' 'औषधि" करे,
और एक 'शब्द' करे 'सौ' 'घाव"...!
"जो 'भाग्य' में है वह भाग कर आएगा..,
जो नहीं है वह आकर भी भाग 'जाएगा"..!
प्रभू' को भी पसंद नहीं
'सख्ती' 'बयान' में,
इसी लिए 'हड्डी' नहीं दी, 'जबान' में...!
जब भी अपनी शख्शियत पर अहंकार हो,
एक फेरा शमशान का जरुर लगा लेना।
और....
जब भी अपने परमात्मा से प्यार हो,
किसी भूखे को अपने हाथों से खिला देना।
जब भी अपनी ताक़त पर गुरुर हो,
एक फेरा वृद्धा आश्रम का लगा लेना।
और….
जब भी आपका सिर श्रद्धा से झुका हो,
अपने माँ बाप के पैर जरूर दबा देना।
जीभ जन्म से होती है और मृत्यु तक रहती है क्योकि वो कोमल होती है.
दाँत जन्म के बाद में आते है और मृत्यु से पहले चले जाते हैं...
क्योकि वो कठोर होते है।
छोटा बनके रहोगे तो मिलेगी हर
बड़ी रहमत...
बड़ा होने पर तो माँ भी गोद से उतार
देती है...
🙏🙏🙏🙏🙏
[21/01 7:49 PM] TOL Savdeshi: त्रो आज से 35 -40 पहले भारत मे कोई सोयाबीन नहीं खाता था !
फिर इसकी खेती भारत मे कैसे होनी शुरू हुई ??
ये जानने से पहलों आपको मनमोहन सिंह द्वारा किए गए एक समझोते
के बारे मे जानना पड़ेगा !
मित्रो इस देश मे globalization के नाम पर ऐसे-ऐसे समझोते हुये कि आप चोंक जाये गये !एक समझोते के कहानी सुने बाकि विडियो में है ! एक देश उसका नाम है होललैंड वहां के सुअरों का गोबर (टट्टी) वो भी 1 करोड़ टन भारत लाया जायेगा ! और डंप किया जायेगा !
ऐसा समझोता मनमोहन सिंह ने एक बार किया था !
जब मनमोहन सिंह को पूछ गया के यह समझोता क्यूँ किया ????
तब मनमोहन सिंह ने कहा होललैंड के सुअरों का गोबर (टट्टी) quality में बहुत बढ़िया है !
फिर पूछा गया कि अच्छा ये बताये की quality में कैसे बढ़िया है ???
तो मनमोहन सिंह ने कहा कि होललैंड के सूअर सोयाबीन खाते है इस लिए बढ़िया है !!
मित्रो जैसे भारत में हम लोग गाय को पालते है ऐसे ही हालेंड के लोग सूअर पालते
है वहां बड़े बड़े रेंच होते है सुअरों कि लिए ! लेकिन वहाँ सूअर मांस के लिए पाला जाता है !
तो फिर मनमोहन सिंह से पूछा गया की ये हालेंड जैसे देशो मे सोयाबीन जाता कहाँ से है ???
तो पता चला भारत से जाता है !! और मध्यपरदेश मे से सबसे जाता है !!!
मित्रो पूरी दुनिया के वैज्ञानिक कहते अगर किसी खेत में आपने 10 साल सोयाबीन उगाया तो 11 वे साल आप वहां कुछ नहीं उगा सकते ! जमीन इतनी बंजर हो जाती है !
अब दिखिए इस मनमोहन सिंह ने क्या किया !???
होललैंड के सुअरों को सोयाबीन खिलाने के लिए पहले मध्यप्रदेश में सोयाबीन कि खेती करवाई !
खेती कैसे करवाई ??
किसानो को बोला गया आपको सोयाबीन की फसल का दाम का ज्यादा दिया जाएगा !
तो किसान बेचारा लालच के चक्कर मे सोयाबीन उगाना शुरू कर दिया !
और कुछ डाक्टरों ने रिश्वत लेकर बोलना शुरू कर दिया की ये सेहत के लिए बहुत अच्छी है
आदि आदि !
तो इस प्रकार भारत से सोयाबीन होलेंड जाने लगी ! ताकि उनके सूअर खाये उनकी चर्बी बढ़े और मांस का उत्पादन ज्यादा हो !
और बाद मे होललैंड के सूअर सोयाबीन खाकर जो गोबर (टट्टी) करेगे वो भारत में लाई जाएगी ! वो भी एक करोड़ टन सुअरों का गोबर(टट्टी ) ऐसा समझोता मनमोहन सिंह ने लिया !
और ये समझोता एक ऐसा आदमी करता है जिसको इस देश में best finance minster का आवार्ड दिया जाता है !
और लोग उसे बहुत भारी अर्थशास्त्री मानते है !! शायद मनमोहन सिंह के दिमाग में भी यही गोबर होगा !
मित्रो दरअसल सोयाबीन मे जो प्रोटीन है वो एक अलग किस्म का प्रोटीन है उस प्रोटीन को शरीर का एसक्रिटा system बाहर नहीं निकाल पाता और वो प्रोटीन अंदर इकठ्ठा होता जाता है !
जो की बाद मे आगे जाकर बहुत परेशान करता है ! प्रोटीन के और भी विकल्प हमारे पास है ! जैसे उरद की दाल मे बहुत प्रोटीन है आप वो खा सकते है ! इसके अतिरिक्त और अन्य डालें है !!
और अंत मे एक और बात मित्रो आपके घर मे अगर दादी - नानी हो तो आप उन्हे पूछे की क्या उनकी माता जी ने उनको कभी सोयाबीन बनाकर खिलाया था ??
आपको सच सामने आ जाएगा !!
ये सारा सोयाबीन का खेल इस लिए खेला गया है !
अधिक जानकारी के लिए देखें !
https://www.youtube.com/watch?v=lZOHx8hRJM4
[21/01 8:44 PM] TOl Dr. Prabhjot Singh: Vanilla Ice Cream that puzzled General motors !!!!
An Interesting Story
Never underestimate your Clients' Complaint, no matter how funny it might seem !
This is a real story that happened between the customer of General Motors
and its Customer-Care Executive. Pls read on.....
A complaint was received by the Pontiac Division of General Motors:
'This is the second time I have written to you, and I don't blame you for
not answering me, because I sounded crazy, but it is a fact that we have a
tradition in our family of Ice-Cream for dessert after dinner each night, but the kind of ice cream varies so, every night, after we've eaten, the whole family votes on which kind of ice cream we should have and I drive down to the store to get it. It's also a fact that I recently purchased a
new Pontiac and since then my trips to the store have created a problem.....
You see, every time I buy a vanilla ice-cream, when I start back from the
store my car won't start. If I get any other kind of ice cream, the car
starts just fine. I want you to know I'm serious about this question, no
matter how silly it sounds, "What is there about a Pontiac that makes it not
start when I get vanilla ice cream, and easy to start whenever I get any
other kind ?"
The Pontiac President was understandably skeptical about the
letter, but sent an Engineer to check it out anyway.
The latter was surprised to be greeted by a successful, obviously well
educated man in a fine neighborhood. He had arranged to meet the man just
after dinner time, so the two hopped into the car and drove to the ice
cream store. It was vanilla ice cream that night and, sure enough, after
they came back to the car, it wouldn't start.
The Engineer returned for three more nights. The first night, they got
chocolate. The car started. The second night, he got strawberry. The car started. The third night he ordered vanilla. The car failed to start.
Now the engineer, being a logical man, refused to believe that this man's car was allergic to vanilla ice cream. He arranged, therefore, to continue his visits for as long as it took to solve the problem. And toward this end
he began to take notes: He jotted down all sorts of data: time of day, type of gas uses, time to drive back and forth etc.
In a short time, he had a clue: the man took less time to buy vanilla than
any other flavor. Why ? The answer was in the layout of the store. Vanilla, being the most popular flavor, was in a separate case at the front of the
store for quick pickup. All the other flavors were kept in the back of the store at a different counter where it took considerably longer to check out
the flavor.
Now, the question for the Engineer was why the car wouldn't start when it took less time. Eureka - Time was now the problem - not the vanilla ice cream !!!! The engineer quickly came up with the answer: "vapor lock".
It was happening every night; but the extra time taken to get the other
flavors allowed the engine to cool down sufficiently to start. When the man got vanilla, the engine was still too hot for the vapor lock to dissipate.
Even crazy looking problems are sometimes real and all problems seem to be simple only when we find the solution, with logical thinking.
Don't just say it is "IMPOSSIBLE" without putting a sincere effort..
What really matters is your attitude and your perception..!