[23/03 8:12 AM] TOl Dr. Prabhjot Singh: ਤੇਰਾ ਉੱਚਾ ਸੁੱਚਾ ਸੀ ਕਿਰਦਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ
ਤਾਂ ਹੀ ਲੋਕੀਂ ਕਰਦੇ ਤੈਨੂੰ ਪਿਆਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ
ਲੋਕ ਮਨਾਂ ਵਿਚ ਤੇਰਾ ਹੈ ਸਤਿਕਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ
ਤੈਨੂੰ ਸੀਸ ਝੁਕਾਉਂਦੇ ਹਾਂ ਸਰਦਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ
ਛੋਟੀ ਉਮਰੇ ਜਿਹੜੇ ਡੱਕੇ ਸਹਿਵਨ ਬੀਜੇ ਤੂੰ,
ਉੱਗੇ ਓਹੋ ਹੀ ਬਣ ਕੇ ਹਥਿਆਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਸਹੁੰ ਖਾਧੀ ਤੂੰ ਜੱਲ੍ਹਿਆਂ ਵਾਲੇ ਬਾਗ ਦੀ ਮਿੱਟੀ ਦੀ,
ਖੂਨੀ ਸਾਕਾ ਸੀ ਵੱਡੀ ਵੰਗਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਚਿੱਤਰ ਸਰਾਭੇ ਦਾ ਤੇਰੇ ਬੋਝੇ ਵਿਚ ਹੁੰਦਾ ਸੀ,
ਛੋਟੀ ਉਮਰਾ ਗਦਰੀ ਸੀ ਕਰਤਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
'ਮੇਰਾ ਰੰਗ ਬਸੰਤੀ ਚੋਲਾ' ਜੋ ਤੂੰ ਗਾਉਂਦਾ ਸੀ,
ਸਿਆਸਤ ਲਈ ਇਹ ਬੋਲ ਬਣੇ ਵਿਉਪਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਜਿਹੜਾ ਸੁਪਨਾ ਲਿਆ ਸੀ ਤੂੰ ਉਹ ਪੂਰਾ ਹੋਇਆ ਨਾ,
ਰੂਹ ਤੇਰੀ 'ਤੇ ਵੀ ਹੋਊਗਾ ਭਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਆਜ਼ਾਦੀ ਲਈ ਲਾੜੀ ਮੌਤ ਵਿਆਹ ਕੇ ਲਿਆਂਦੀ ਤੂੰ,
ਰਾਜਗੁਰੂ ਸੁਖਦੇਵ ਤਿਰੇ ਸੀ ਯਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਸਾਲ ਛਿਮਾਹੀ ਮਗਰੋਂ ਥੋਡੇ ਬੁੱਤਾਂ ਨੂੰ ਨੇਤਾ,
ਪਾ ਜਾਂਦੇ ਨੇ ਆ ਫੁੱਲਾਂ ਦੇ ਹਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਗੋਰਾ ਸ਼ਾਹੀ ਜੋ ਕੁਝ ਇੱਥੇ ਕਰਦੀ ਹੁੰਦੀ ਸੀ,
ਉਹ ਹੀ ਭੂਰਾ ਸ਼ਾਹੀ ਦਾ ਕਿਰਦਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਉੱਨੀ ਸੌ ਸੱਤ ਸਤੰਬਰ ਦਾ ਸੀ ਦਿਨ ਅਠਾਈਵਾਂ,
ਤੇਰੀ ਪਹਿਲੀ ਚੀਕ ਬਣੀ ਲਲਕਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਤੇਰਾ ਸ਼ਹੀਦੀ ਦਿਵਸ ਮਨਾਉਂਦੇ ਊਂ ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਹੀ,
ਅਮਲਾਂ ਬਾਝੋਂ ਕਰਦੇ ਜੈ ਜੈ ਕਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਤੇਰਾ ਅੱਵਲ ਤੇ ਆਖਰ ਜੋ ਪਿਆਰ ਆਜ਼ਾਦੀ ਸੀ,
ਉਸ ਨੂੰ ਜੋਰੀਂ ਲੈ ਗਏ ਸ਼ਾਹੂਕਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਵੱਡੇ ਨੋਟਾਂ 'ਤੇ ਕਿਉਂ ਛਪਦਾ ਚਿੱਤਰ ਨਈਂ ਤੇਰਾ,
ਪੰਜ ਦਮੜੇ ਬਸ ਤੇਰਾ ਭਾਅ ਬਾਜ਼ਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਸੋਚ ਤਿਰੀ ਨੂੰ ਧੁੰਦਲੀ ਕਰਦੀ ਫਿਰਦੀ ਹੈ ਚਾਂਦੀ,
ਢਕਣਾ ਚਾਹੁੰਦੈ ਸੂਰਜ ਨੂੰ ਅੰਧਕਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਵਕਤ ਆਵੇਗਾ ਤੇਰੇ ਨਾਂ ਦੇ ਝੰਡੇ ਝੂਲਣਗੇ,
ਠਾਣੀ ਬੈਠੇ ਤੇਰੇ ਪੈਰੋਕਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਤੇਰੀ ਮੂਰਤ ਛਾਪਣ ਪਿੱਛੇ ਝਗੜੀ ਜਾਂਦੇ ਨੇ,
ਟੋਪੀ ਜਾਂ ਪਗੜੀਧਾਰੀ ਸਰਦਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਸੁਪਨੇ ਤੇਰੇ ਪੈਰਾਂ ਹੇਠ ਮਧੋਲ਼ੀ ਜਾਂਦੇ ਨੇ,
ਚਿੱਟਾ ਬਾਣਾ ਪਾ ਬੈਠੇ ਗੱਦਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਖਬਰ ਮਿਲੀ ਤੂੰ ਪਾਲ ਸ਼ਹੀਦਾਂ ਦੀ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਈਂ,
ਸਾਲ ਚੌਰਾਸੀ ਗੁਜਰ ਗਏ ਨੇ ਯਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਗੋਰੇ ਬਿੱਲੇ ਕੀ ਸੀ ? ਕਾਲ-ਕਲੂਟੇ ਤੱਕ ਜਰਾ,
ਲੁੱਟ ਕੇ ਖਾ ਗਏ ਭਾਰਤ ਨੂੰ ਮੱਕਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਸ਼ੋਭਾ ਖਾਤਰ ਸਾਰੇ ਤੈਨੂੰ ਅਪਣਾ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ,
ਬੇਸ਼ਕ ਤੂੰ ਸੀ ਜੱਟ ਸੰਧੂ ਸਰਦਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
ਤੇਰੇ ਨਾਂ ਤੋਂ ਗੋਰੇ ਬਿੱਲੇ ਥਰ ਥਰ ਕੰਬਦੇ ਸੀ,
'ਸੂਫ਼ੀ' ਤੇਰੇ ਵਰਗਾ ਹੁਣ ਦਰਕਾਰ ਭਗਤ ਸਿੰਹਾਂ.
[23/03 11:02 AM] TOL Rohit Bhatia: Mukadar te jitt de shaukeen ne mann sab
[23/03 11:53 AM] +91 99154 58175: 2 मिनिट लगेंगे जरूर पढिये,भगत सिंग के फासी के 3
घंटे पहले का ऐतिहासिक किस्सा
23 मार्च का दिन उन आम दिनों की तरह ही शुरू हुआ जब सुबह के समय राजनीतिक बंदियों को उनके बैरक से बाहर निकाला जाता था। आम तौर पर वे दिन भर बाहर रहते थे और सूरज ढलने के बाद वापस अपने बैरकों में चले जाते थे। लेकिन आज वार्डन चरत सिंह शाम करीब चार बजे ही सभी कैदियों को अंदर जाने को कह रहा था। सभी हैरान थे, आज इतनी जल्दी क्यों। पहले तो वार्डन की डांट के बावजूद सूर्यास्त के काफी देर बाद तक वे बाहर रहते थे। लेकिन आज वह आवाज काफी कठोर और दृढ़ थी। उन्होंने यह नहीं बताया कि क्यों? बस इतना कहा, ऊपर से ऑर्डर है।
चरत सिंह द्वारा क्रांतिकारियों के प्रति नरमी और माता-पिता की तरह देखभाल उन्हें दिल तक छू गई थी। वे सभी उसकी इज्जत करते थे। इसलिए बिना किसी बहस के सभी आम दिनों से चार घंटे पहले ही अपने-अपने बैरकों में चले गए। लेकिन सभी कौतूहल से सलाखों के पीछे से झांक रहे थे। तभी उन्होंने देखा बरकत नाई एक के बाद कोठरियों में जा रहा था और बता रहा था कि आज भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा।
हमेशा की तरह मुस्कुराने वाला बरकत आज काफी उदास था। सभी कैदी खामोश थे, कोई कुछ भी बात नहीं कर पा रहा था। सभी अपनी कोठरियों के बाहर से जाते रास्ते की ओर देख रहे थे। वे उम्मीद कर रहे थे कि शायद इसी रास्ते से भगत सिंह और उनके साथी गुजरेंगे।
फांसी के दो घंटे पहले भगत सिंह के वकील मेहता को उनसे मिलने की इजाजत मिल गई। उन्होंने अपने मुवक्किल की आखिरी इच्छा जानने की दरखास्त की थी और उसे मान लिया गया। भगत सिंह अपनी कोठरी में ऐसे आगे-पीछे घूम रहे थे जैसे कि पिंजरे में कोई शेर घूम रहा हो। उन्होंने मेहता का मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया और उनसे पूछा कि क्या वे उनके लिए 'दि रेवोल्यूशनरी लेनिन' नाम की किताब लाए हैं। भगत सिंह ने मेहता से इस किताब को लाने का अनुरोध किया था। जब मेहता ने उन्हें किताब दी, वे बहुत खुश हुए और तुरंत पढ़ना शुरू कर दिया, जैसे कि उन्हें मालूम था कि उनके पास वक्त ज्यादा नहीं है। मेहता ने उनसे पूछा कि क्या वे देश को कोई संदेश देना चाहेंगे, अपनी निगाहें किताब से बिना हटाए भगत सिंह ने कहा, मेरे दो नारे उन तक पहुंचाएं..इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद। मेहता ने भगत सिंह से पूछा आज तुम कैसे हो? उन्होंने कहा, हमेशा की तरह खुश हूं। मेहता ने फिर पूछा, तुम्हें किसी चीज की इच्छा है? भगत सिंह ने कहा, हां मैं दुबारा इस देश में पैदा होना चाहता हूं ताकि इसकी सेवा कर सकूं। भगत ने कहा, पंडित नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने जो रुचि उनके मुकदमे में दिखाई उसके लिए दोनों का धन्यवाद करें।
मेहता के जाने के तुरंत बाद अधिकारियों ने भगत सिंह और उनके साथियों को बताया कि उन्हें फांसी का समय 11 घंटा घटाकर कल सुबह छह बजे की बजाए आज साम सात बजे कर दिया गया है। भगत सिंह ने मुश्किल से किताब के कुछ पन्ने ही पढ़े थे। उन्होंने कहा, क्या आप मुझे एक अध्याय पढ़ने का भी वक्त नहीं देंगे? बदले में अधिकारी ने उनसे फांसी के तख्ते की तरफ चलने को कहा। एक-एक करके तीनों का वजन किया गया। फिर वे नहाए और कपड़े पहने। वार्डन चतर सिंह ने भगत सिंह के कान में कहा, वाहे गुरु से प्रार्थना कर ले। वे हंसे और कहा, मैंने पूरी जिंदगी में भगवान को कभी याद नहीं किया, बल्कि दुखों और गरीबों की वजह से कोसा जरूर हूं। अगर अब मैं उनसे माफी मांगूगा तो वे कहेंगे कि यह डरपोक है जो माफी चाहता है क्योंकि इसका अंत करीब आ गया है।
तीनों के हाथ बंधे थे और वे संतरियों के पीछे एक-दूसरे से ठिठोली करते हुए सूली की तरफ बढ़ रहे थे। उन्होंने फिर गाना शुरू कर दिया-'कभी वो दिन भी आएगा कि जब आजाद हम होंगे, ये अपनी ही जमीं होगी ये अपना आसमां होगा। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बाकी यही नाम-ओ-निशां होगा।'
जेल की घड़ी में साढ़े छह बज रहे थे। कैदियों ने थोड़ी दूरी पर, भारी जूतों की आवाज और जाने-पहचाने गीत, 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' की आवाज सुनी। उन्होंने एक और गीत गाना शुरू कर दिया, 'माई रंग दे मेरा बसंती चोला' और इसके बाद वहां 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आजाद हो' के नारे लगने लगे। सभी कैदी भी जोर-जोर से नारे लगाने लगे।
तीनों को फांसी के तख्ते तक ले जाया गया। भगत सिंह बीच में थे। तीनों से आखिरी इच्छा पूछी गई तो भगत सिंह ने कहा वे आखिरी बार दोनों साथियों से गले लगना चाहते हैं और ऐसा ही हुआ। फिर तीनों ने रस्सी को चूमा और अपने गले में खुद पहन लिए। फिर उनके हाथ-पैर बांध दिए गए। जल्लाद ने ठीक शाम 7:33 बजे रस्सी खींच दी और उनके पैरों के नीचे से तख्ती हटा दी गई। उनके दुर्बल शरीर काफी देर तक सूली पर लटकते रहे
[23/03 12:43 PM] TOL Rohit Bhatia: "इस कद्र वाकिफ है मेरी कलम मेरे जज्बातों से, अगर मैं इश्क़ लिखना भी चाहूं तो इंक़लाब लिखा जाता है ।।"
-भगत सिंह
#आज 23 मार्च शहीद-ए-आज़म भगतसिंह की पूण्यतिथि पर उनको शत् शत् नमन 🙏
।। इन्कलाब जिंदाबाद ।। ✊
[23/03 1:25 PM] TOL Dr. Harjot Kamal: अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो, जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है, कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है
[23/03 5:47 PM] TOL Amrinder Singh: Kitab di pithwarli kamal di likhia e Bai Amarjit Ji ne
[23/03 5:55 PM] TOL Dr. Harjot Kamal: Four Seconds, by leadership coach Peter Bregman, suggests a few moments is all you need to prevent yourself from behaviour you'll later regret.
According to Bregman, you can dramatically reduce stress by pausing for four seconds - the length of a deep breath - before you take certain actions, whether it's indulging a bad habit or joining an angry email exchange.
[23/03 6:08 PM] Dr Amarjeet Astrologist: जब तुम किसी whatsapp friend के घर पे जाओ
और अगर उसकी पत्नी तुम्हे देखकर अपने कपडे ठीक करने लगे।
तब समज लेना की आपके सारे messages भाभीजि ने भी पढ़े है 😜😜😜😃😃😃
[23/03 8:18 PM] TOL Dr. Bir: "मेरी कलम भी वाकिफ हैं मेरे ज़ज्बातों से.. मैं "इश्क" भी लिखना चाहूँ तो "इन्क़लाब" लिखा जाता है"
शहीद दिवस के दिन भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव को शत शत नमन।।
[23/03 8:49 PM] +91 97799 51799: एक फैमिली "शोले" फिल्म देखकर घर पर लौटी...
फिल्म का जोश रग रग में दौड रहा था...
पति मजाकिया मुड में अपनी पत्नी से: नाच 💃 बसंती नाच 💃 ...!!!
तभी बच्चों ने कहा: मम्मी - इस कुत्ते के सामने मत नाचना...!!!???