Monday, March 23, 2015

March18

[18/03 7:14 AM] Dr Amarjeet Astrologist: यदि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है तो अभी तक उसने इस 'सर्वश्रेष्ठता' से अन्य प्राणियों को भयंकर नुक्सान पहुँचाया है। अनादि-अनंत ईश्वरीयता और उसके रहस्यों का आनंद लेना तो दूर, उसने प्रकृति को नष्ट करके वायुमंडल, नदियों-समन्दरों और आकाशमण्डल को प्रदूषण से भर दिया है।
यदि कुछ गिने-चुने मनुष्यों की दुर्लभ प्रज्ञा से मनुष्य-समाज के लिए अनिवार्य क़ानून न बनाये जाते तो मनुष्य एक-दूसरे से लड़-लड़ कर समाप्त हो जाता।
आज भी हर देश दूसरे देश के सबसे स्वस्थ युवाओं को मारने के लिए अपने बजट का सबसे अधिक धन खर्च करता है।
यदि क़ानून का डर न हो तो मनुष्य अपने ही देश के लोगों को मार डाले। स्त्रियां तत्काल गुलाम बना ली जाएं।

मनुष्य डर के मारे ही भला बना फिरता है।

मनुष्य जन्म से ही सबसे कमज़ोर और सबसे भयभीत प्राणी है। सर्वश्रेष्ठ कुछ कृष्ण, कुछ बुद्ध होते हैं। 
अपने भय से मुक्त होने के लिए मनुष्य ने स्वयं को आंतरिक रूप से समर्थ बनाने के बजाय 'हनुमान चालीसा' जैसी थोथी चीज़ों का सहारा लेना ठीक समझा है।

तुलसीदास को 'हनुमान चालीसा' का रचनाकार माना जाता है। रामचरितमानस और तुलसीसाहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि जीवन के अंत में तुलसीदास की एक बांह में चोट लगी तो वे रामचन्द्र, हनुमान और शिव से प्रार्थना करने लगे कि वे उनकी बांह ठीक कर दें।
लेकिन जब ज़ख्म सड़ गया और ज़हर शरीर में फैलने लगा तो तुलसीदास ने अपने आराध्यों को बुरा-भला कहना शुरू कर दिया। उसी में वे चल बसे। 

डर की असली जड़ को जानने के बजाय मनुष्य ने नकली 'शक्तियां' बना लीं और मरते समय भी अपनी साँसों पर शांत होकर ध्यान देने के बजाय वह उन्हीं नकली शक्तियों का जाप करता है या उसके लिए दूसरे लोग जाप करते हैं। कान में मुर्दा मन्त्र और मुंह में 'पवित्र' जल डाल कर मान लिया जाता है कि मरने वाला अमर हो गया या स्वर्गवासी! सारी ज़िन्दगी मुर्दा बने रहने वाले बिजूके की झाड़-फूंक!

यह मूर्खता मनुष्य को स्वयं से न तो मिलने देती हैं, न ही स्वयं को जानने देती हैं।

सूर्य हमारे सौरमंडल का साकार ईश्वर है, जिसे हम रोज़ खुली आँखों से देख और महसूस कर सकते हैं।
वह अभी बुझ जाए तो हमारे सारे भोले शंकर सिर्फ कंकर और सारी मातारानियाँ खसमा नूं खानियाँ साबित हो जाएं। 
लेकिन हम सूर्य को अपनी रगों में भी महसूस नहीं करना चाहते। जो लोग उसे अर्घ्य देते हैं, वे भी तत्काल गोबरगणेश देवताओं की पूजा में बैठ जाते हैं।

हमारा डर इतना है कि हम सबसे ज़्यादा खुद से डरते हैं।
अकेले रहने से मनुष्य बहुत जल्दी डर जाता है।
वह अपना सामना नहीं करना चाहता।
इसलिए उसने मृत देवी-देवताओं की फ़ौज बना ली है और उसे अपने भय दूर करने का ठेका दे दिया है।

क्या मनुष्य इन प्रपंचों से कभी छूटेगा?

यह मनुष्य का सौभाग्य है कि हर युग में वास्तविक ब्रह्मांडीय शक्तियों को जानने वाले थोड़े-से मनुष्य भी धरती पर आते रहते हैं और मनुष्य समाज का दिया ज़हर पीकर और मनुष्य समाज की दी गई सूली पर चढ़कर भी मनुष्य को बचा लेते हैं, वरना मनुष्य कब का दुनिया का बोझ कम कर चुका होता।

ज़रा-से साहस को भी जो लोग 'अव्यावहारिक' बताते हैं, यह दुनिया उन्हीं से भरी पड़ी है।
लेकिन मुर्दे किसी गिनती में नहीं आते, वोट कितने भी देते हों।

प्रलय बहुत सुन्दर चीज़ है। यह सदा से आती रही है। यह एक लय है।  परम आत्मा की लय !
यह जब आती है तो सबसे पहले कायर मनुष्यों और उनके बनाए भगवानों और देवीदेवताओं को रफा-दफा करती है।

अधिकांश मनुष्य मच्छरों से भी गए-बीते हैं।
उनके नष्ट होने पर न प्रकृति रोती है न ब्रह्मांडीय शक्तियां!

किसी कबीर या किसी बुद्ध को न तो किसी शाब्दिक मन्त्र की ज़रुरत पड़ती है, न ही किसी देवी-देवता की !
न शिव की, न हनुमान या गणेश की !
'पवित्र' या 'मृत' भाषा की तो कतई नहीं!

क्यों ?
[18/03 7:19 AM] TOL Manpreet Kaur: Really nice..
[18/03 7:31 AM] Dr Amarjeet Astrologist: किसी बात को अनुभव किए बिना किताबी जानकारी या पूर्वाग्रह के आधार पर या उधार में मिले 'संस्कार' पर सहमत या असहमत होना लोगों की आदत है। लेकिन बहस भर के लिए बहस करना तो बीमारी ही है।
बहस के अभ्यस्त लोगों का तमाशा देखना हो तो आस्तिक किस्म के लोगों के सामने कहो : "ईश्वर नहीं है !"
नास्तिक किस्म के लोगों के सामने कह दो : "ईश्वर है।"
इन्हें बताना असंभव है कि ईश्वर का होना या न होना बाद में, पहले अपने 'होने या होने की हालत' का गहराई से पता लगाना होता है।
उसके बाद कुछ भी कहने से पहले चेतना से चलना पड़ता है, जानकारी से नहीं।
अनुभव मौन ज़्यादा पसंद करता है और जानकारी बहस ज़्यादा पसंद करती है। पहुँचती कहीं नहीं।
खुजाने के लिए अगले विचार का इंतज़ार करती है।
ईश्वर का अर्थ ही पता नहीं है, और उसके होने और नहीं होने पर सदियों से लड़ते आ रहे हैं।
अरे, भई, ठीक जैसे आईने में ठीक से अपनी चाँद-सी सूरत देख लो न !
उसी में सब कुछ मिल सकता है।
[18/03 8:16 AM] Dr Amarjeet Astrologist: ਸਮਾਂ ਪਾ ਕੇ
ਤੁਸੀਂ ਅਜਿਹੇ ਮੁਕਾਮ ਤੇ ਪਹੁੰਚ ਜਾਵੋਗੇ
ਜਿੱਥੇ ਤੁਸੀਂ ਹੋਰਾਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਜਿੱਤਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ ਕਰਨ ਦੀ ਹੋਰ ਜਿਆਦਾ ਜਰੂਰਤ ਮਹਿਸੂਸ ਨਹੀਂ ਕਰੋਗੇ
ਜੇ ਉਹ ਤੁਹਾਨੂੰ ਪਸੰਦ ਕਰਦੇ ਹੋਣਗੇ ਤਾਂ ਵਧੀਆ ਗੱਲ ਹੈ
ਨਹੀਂ ਤਾਂ
ਜੇ ਉਹ ਤੁਹਾਨੂੰ ਪਸੰਦ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ ਹੋਣਗੇ ਤਾਂ ਇਹ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਸਮੱਸਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਵਿੱਚ ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਹੀ ਨੁਕਸਾਨ ਹੈ
[18/03 8:20 AM] Dr Amarjeet Astrologist: ਜਿਹੜਾ ਮਨੁੱਖ ਆਪਦੀਆਂ ਕਮਜੋਰੀਆਂ ਦੱਸਦਾ ਹੈ ,, ਤਾਂ ਲਾਜ਼ਮੀ ਹੈ ,
ਉਹਦੇ ਕੋਲ ਕੋਈ ਅਜਿਹੀ ਤਾਕਤ ਵੀ ਹੋਵੇਗੀ ,, ਜਿਸ ਨਾਲ ਉਹ ਆਪਣੀਆਂ ਕਮਜੋਰੀਆਂ ਦੱਸ ਕੇ ਵੀ ਕਮਜੋਰ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗਾ ,,

ਅਤੇ ,

ਜਿਹੜਾ ਮਨੁੱਖ ਦੂਸਰਿਆਂ ਦੀਆਂ ਕਮਜੋਰੀਆਂ ਨੂੰ ਦੱਸਦਾ ਹੈ ,, ਤਾਂ ਲਾਜ਼ਮੀ ਹੈ ,
ਉਹ ਖੁਦ ਬਹੁਤ ਕਮਜੋਰ ਹੋਵੇਗਾ ,, ਜਿਸ ਕਰਕੇ ਉਹ ਦੂਸਰਿਆਂ ਦੀਆਂ ਕਮਜੋਰੀਆਂ ਦੱਸ ਕੇ ਆਪ ਤਾਕਤਵਰ ਹੋਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ ,,
[18/03 8:21 AM] TOl Yatin: Well said sirjee
[18/03 9:17 AM] TOL Sarabjit Maan: Dr saab bahut khoob
[18/03 11:22 AM] TOL Money Matters: किसी मज़ार पर एक फकीर रहते थे।
👳
सैकड़ों भक्त उस मज़ार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे।
😪😪😪😪😪😪😪😪
उन भक्तों में एक बंजारा भी था।
👴
वह बहुत गरीब था,

फिर भी,
नियमानुसार आकर माथा टेकता,

फकीर की सेवा करता,

और
फिर अपने काम पर जाता,
उसका कपड़े का व्यवसाय था,
🌋🌌🌠🌁🌈🌋🌌🌠🌁
कपड़ों की भारी पोटली कंधों पर
लिए सुबह से लेकर शाम तक गलियों में फेरी लगाता,
कपड़े बेचता।
🎑
एक दिन उस फकीर को उस
पर दया आ गई,
उसने अपना गधा उसे भेंट कर दिया।

अब तो बंजारे
की आधी समस्याएं हल हो गईं।
वह सारे कपड़े गधे पर लादता और
जब थक जाता
तो

खुद भी गधे पर बैठ जाता।
🏇
यूं ही कुछ महीने बीत गए,,

एक दिन गधे की मृत्यु हो गई।
🐎
बंजारा बहुत दुखी हुआ,
उसने उसे उचित स्थान पर दफनाया,
उसकी कब्र बनाई

और
फूट-फूट कर रोने लगा।
😂
समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने
जब यह दृश्य देखा,
तो सोचा
जरूर किसी संत की मज़ार होगी।
तभी यह
बंजारा यहां बैठकर अपना दुख रो रहा है।
यह सोचकर उस व्यक्ति ने कब्र पर
माथा टेका और अपनी मन्नत हेतु वहां प्रार्थना की कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया।
😛
कुछ दिनों के उपरांत ही उस
व्यक्ति की कामना पूर्ण हो गई। उसने
खुशी के मारे सारे गांव में
डंका बजाया कि अमुक स्थान पर एक पूर्ण फकीर की मज़ार है।
वहां जाकर
जो अरदास करो वह पूर्ण होती है।
मनचाही मुरादे बख्शी जाती हैं वहां।

उस दिन से उस कब्र पर
भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया।
🚶🏃🚶🏃👫👪👬👭👯
दूर-दराज से भक्त अपनी मुरादे बख्शाने वहां आने लगे।
बंजारे की तो चांदी हो गई,

बैठे-बैठे उसे कमाई
का साधन मिल गया था।
👍
एक दिन वही फकीर
जिन्होंने बंजारे
को अपना गधा भेंट स्वरूप
दिया था वहां से गुजर रहे थे।
😣
उन्हें देखते ही बंजारे ने उनके चरण पकड़ लिए और बोला-
"आपके गधे ने
तो मेरी जिंदगी बना दी। जब तक जीवित था
तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था
और
मरने के बाद
मेरी जीविका का साधन बन
गया है।"
👴
फकीर हंसते हुए बोले,
"बच्चा!
जिस मज़ार
पर तू नित्य माथा टेकने आता था,

वह मज़ार इस गधे की मां की थी।"😜
🐴🐴🐴🐴

सबक-मेरा भारत महान ।
          Incredible India.
[18/03 4:32 PM] TOL Dr. Arun: 😎😎😜😜
🎭 जो ग्रुप मेम्बर योगदान नहीं दे सकते वो कम से कम इतना तो जरूर करें कि जो लोग योगदान दे रहे हैं उनकी हौसला अफजाई करते रहे..

तालियों से (👏)...
पसंद से (👍)...
बहतरीन से(👌)...
हाथ जोड़ कर सम्मान से(🙏)...
मुस्कुरा कर(😀)...
कभी शरारती बनकर (😜😛😀😚)....
और कभी कभी मूह 📱से।

अरेभाई जुवान पर लगा 🔒तो खोलिए🔐

कुछ तो दिन तो गुज़ारो ग्रुप मे ..💯👆🙏

😜😜😎😎😎😎😎
[18/03 7:00 PM] TOL Amrinder Singh: Apne MATLAB lai nahi sutde kuda bahar...

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