Tuesday, February 3, 2015

Jan27

[27/01 12:21 AM] TOL Dr. Arun: स्वामी रामसुखदासजी.

‘वासुदेवः सर्वम्’ की सिद्धि कैसे करें ?

प्रश्न—सब कुछ भगवान् ही हैं—ऐसा अनुभव करनेका साधन क्या है ? किस तरह इसकी सिद्धि होती है ?
उत्तर—अगर आप ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करना चाहते हैं तो बड़ी दृढधातासे इस बातको मान लें कि जिस शरीरको हम अपना मानते हैं, वह हमें संसारसे मिला है और छूट जायगा; अतः वह मेरा नहीं है । प्रत्यक्ष बात है कि शरीर जन्मसे पहले मेरा नहीं था और मृत्युके बाद मेरा नहीं रहेगा और अभी भी प्रतिक्षण मेरेसे अलग हो रहा है । जितनी उम्र बीत गयी, उतना तो शरीर हमसे अलग हो गया है, अब बाकी कितना रहा है, इसका पता नहीं । कर्मयोगकी दृष्टिसे शरीर संसारका है, ज्ञानयोगकी दृष्टिसे प्रकृतिका है और भक्तियोगकी दृष्टिसे परमात्माका है । शरीरको किसीका भी मानें, पर यह मेरा नहीं है—यह सर्वसिद्धान्त है । जो वस्तु मिली हुई है और बिछुड जायगी, वह अपनी कैसे हुई ? शरीर मिला हुआ है, बिछुड जायगा और निरन्तर बिछुड रहा है—ये तीनों बातें सन्देहरहित हैं ।

इस प्रकार शरीरको संसारका मानकर संसारकी सेवामें लगा दें और शरीर, मन, वाणीसे किसीका भी बुरा न चाहें तो ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव हो जायगा । हमें वही सेवा करनी है,जिसको करनेकी हमारेंमें सामर्थ्य है और सेवा लेनेवाला हमारेसे न्याययुक्त सेवा चाहता है । जो हमारेसे अन्याययुक्त, शास्त्रविरुद्ध सेवा चाहता है, उसको नहीं करना है । हम ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करना चाहते हैं, तो अन्याययुक्त काम हम नहीं करें और न्याययुक्त काम भी उतना करें, जितनी हमारी शक्ति है । एक मार्मिक बात है कि भला करनेकी अपेक्षा बुरा न करना ( बुराईका त्याग ) बहुत ऊँची साधना है । भलाई करनेमें जोर आता है, पर बुराई न करनेमें कोई जोर नहीं आता । बुराई न करनेसे दो बातें होंगी—केवल भलाई करेंगे अथवा कुछ भी नहीं करेंगे । कुछ भी नहीं करनेसे परमात्मामें स्वतः स्थिति होती है; क्योंकि कुछ करनेसे ही संसारमें स्थिति होती है । भलाई करनेसे अभिमान आ सकता है, पर बुराई न करनेसे अभिमान आता ही नहीं । इसलिए बुराईका त्याग करें अर्थात् न बुरा करें, न बुरा सोचें और न बुरा कहें ।
भागवतमें ‘वासुदेवः सर्वम्’ का साधन बताया है—

विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रिडां च दैहिकीम् ।
प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम् ॥
( श्रीमद्भागवत ११/२९/१६ )

‘हँसी उड़ानेवाले अपने लोगोंको और अपने शरीरकी दृष्टिको भी लेकर जो लज्जा आती है, उसको छोडकर अर्थात् उसकी परवाह न करके कुत्ते, चाण्डाल, गौ एवं गधेको भी पृथ्वीपर लंबा गिरकर भगवद् बुद्धिसे साष्टांग प्रणाम करें ।’

जो भी प्राणी सामने आये, उसको साष्टांग प्रणाम करें । शरीरकी लज्जा आती हो तो उसको छोड़ दें और लोग हँसी उड़ाते हों उसकी परवाह मत करें; क्योंकि हमें उससे क्या मतलब ? हमें तो ‘वासुदेवः सर्वम्’ सिद्ध करना है । दृढ़ निश्चय हो जायगा तो ऐसा करनेमें कठिनता नहीं होगी । अगर कठिनता लगती हो तो मनसे ही दण्डवत् प्रणाम कर लें । ऐसा कोई प्राणी न छूटे, जिसको नमस्कार न किया हो । किसी भी वर्ण, आश्रम, जाति, धर्म, सम्प्रदायका मनुष्य हो, वह भगवान् ही है । इसमें चार बातें है—१. इन प्राणियोंके भीतर भगवान् हैं, २. ये भगवान् के भीतर हैं, ३. ये भगवान् के हैं और ४. ये भगवान् ही हैं—ऐसा मानना सबसे सुगम है । अतः ऐसा मान लें कि ये भगवान् के हैं, भगवान् को प्यारे है, इसलिए हम इनको प्रणाम करते हैं । ऐसा करनेका परिणाम क्या होगा, यह भगवान् बताते हैं—

नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात् ।
स्पर्धाऽसूयातिरस्काराः साहङ्कारा वियन्ति हि ॥
(श्रीमद्भागवत ११/२९/१५ )

‘जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है अर्थात् उनमें मुझे ही देखता है, तब शीध्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषदृष्टि, तिरस्कार आदि दोष अहंकार-सहित सर्वथा दूर हो जाते हैं ।’

इसलिए मनुष्यमात्रमें भगवान् का भाव रखें । कहीं भाव न हो सके तो मनसे माफ़ी माँग लें । किसीको कहनेकी, जनानेकी जरुरत नहीं । शरीर-मन-वाणीसे संसारकी सेवा करनी है और संसार भगवान् का विराट् रूप है । अतः भगवान् के ही शरीर-मन-वाणीसे भगवान् की ही सेवा करनी है । फिर ‘वासुदेवः सर्वम्’ सिद्ध हो जायगा; क्योंकि यह कोई नया निर्माण नहीं है, प्रत्युत पहलेसे ही है । इसके लिए विद्याध्ययन, धनसम्पत्ति, बल, अनुष्ठान आदिकी जरुरत नहीं है । इसको हरेक भाई-बहन कर सकता है ।

सन्तोंने कहा है—

हाथ काम मुख राम है, हिरदै साची प्रीत ।
दरिया गृहस्थी साध की, याही उत्तम रीत ॥

हाथसे काम करते रहें और मुखसे राम-राम करते रहें । इसके साथ ही भगवान् से बार-बार कहते रहें कि ‘हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं’ । किसीको बुरा मत मानें । किसीको बुरा मान लिया तो समझें कि हमारा व्रत भंग हो गया ! अतः उसको प्रत्यक्ष अथवा मनसे नमस्कार करके क्षमा माँग ले । फिर भगवान् से प्रार्थना करें कि ‘हे नाथ ! मैं भूलूँ नहीं; हे प्रभो ! मेरा यह साधन सिद्ध हो जाय !’ एक साधु थे । उनको सत्संगमें कोई बात अच्छी लगती तो भगवान् से कह देते कि ‘महाराज ! यह बात आप अपने खजानेमें जमा कर लो, अगर मैं भूल जाऊँ तो मेरेको याद दिला देना’ । भगवान् के समान कोई मालिक नहीं, कोई नौकर नहीं, कोई मित्र नहीं ! अचानक बैठे-बैठे भगवान् की याद आ जाय तो यह समझकर बड़े खुश हो जाना चाहिए कि भगवान् मेरेको याद कर रहे हैं ! भगवान् ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा कर दी ! मैं तो भूल गया था, पर भगवान् ने याद कर लिया, जिससे मेरेको भगवान् याद आ गए । इस प्रकार भगवान् की कृपाका आश्रय लेनेपर ‘वासुदेवः सर्वम्’ का साधन सुगम हो जायगा; क्योंकि ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’ —यह बात कृपासे समझमें आती है, अपनी बुद्धिमानीसे, अपने उद्योगसे नहीं । उद्योग करनेसे तो कर्तृत्व आता है, जो इसके अनुभवमें बाधक है । आजतक जितने भी महात्मा हुए हैं, वे भगवत्कृपासे जीवन्मुक्त, तत्वज्ञ और भगवत्प्रेमी हुए हैं, अपने उद्योगसे नहीं । इसलिए साधकको उद्योगका आश्रय न लेकर भगवत्कृपाका ही आश्रय लेना चाहिए । शरीर-इन्द्रियोंकी सार्थकताके लिए उद्योग करना चाहिए, पर परमात्मतत्व उद्योगसाध्य नहीं है ।
—‘अमरताकी ओर’ पुस्तक
[27/01 9:00 AM] TOL Mohit Sood: ਮੈਂ ਨਹੀਂ ਪਾਉਂਦਾ ਬਰੈਂਡਡ ਸੂਟ ਕਿਉਂਕਿ
ਮੈਂ ਦੇਖਿਆ ਮੇਰੇ ਬਾਪੂ ਦਾ ਪਾਟਿਆ ਕੁੜਤਾ,
ਮੈਥੋਂ ਨਹੀਂ ਘੁੰਮਿਆ ਜਾਂਦਾ ਕੁੱਲੂ ਮਨਾਲੀ
ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਦੇਖੀ ਏ ਆਪਣੀ ਮਾਂ
ਜੇਠ ਹਾੜ੍ਹ ਦੀਆਂ ਧੁੱਪਾਂ ਵਿੱਚ ਰੋਟੀ ਪਕਾਉਂਦੀ,
ਮੈਥੋਂ ਨਹੀਂ ਖੜ ਹੁੰਦਾ ਵੇਹਲੜਾਂ ਵਾਂਗ ਮੋੜਾਂ ਤੇ,
ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਦੇਖਿਆ ਮੇਰਾ ਬਾਪੂ ਦਿਨ ਰਾਤ
ਮਿੱਟੀ ਨਾਲ਼ ਮਿੱਟੀ ਹੁੰਦਾ,
ਮੈਥੋਂ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਮਾਂ ਤੇ ਬਾਪੂ ਨਾਲ਼ ਧੋਖਾ ਕਿਉਂਕਿ
ਮੈਂ ਦੇਖੇ ਨੇ ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ 'ਚ ਆਸਾਂ ਦੇ ਚਿਰਾਗ
[27/01 9:00 AM] TOL Mohit Sood: पतंग सी हैं जिंदगी, कहाँ तक जाएगी..!

रात हो या उम्र, एक ना एक दिन कट ही जाएगी..!
[27/01 9:56 AM] TOL Dr. Arun: क्रोधपर विजय कैसे हो ?

(गत ब्लॉगसे आगेका)

परिवारमें रहना क्या है ? आपके कर्तव्यका आपपर दायित्व है । आपका कर्तव्य क्या है ? स्त्री मानें, न मानें; पुत्र मानें, न मानें; भाई मानें, न मानें; माँ-बाप मानें, न मानें; भौजाई और भतीजे मानें, न मानें; आप अपने कर्त्तव्यका ठीक तरह पालन करें । वे अपना कर्त्तव्य पालन करते हैं या नहीं करते, उधर आप देखो ही मत । क्योंकि जब आप उनके कर्त्तव्यको देखते हो कि ‘ये उदण्ड न हो जायँ ।’ ऐसे समयमें आप अपने कर्त्तव्यसे च्युत ही हैं, आप अपने कर्त्तव्यसे गिरते हो; क्योंकि आपको दूसरोंका अवगुण देखनेके लिये कर्त्तव्य कहाँ बताया है ? शास्त्रोंमें कहीं भी यह नहीं बताया है कि तुम दूसरोंका अवगुण देखा करो; प्रत्युत यह बताया है कि यह संसार गुण-दोषमय है–

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक ।
गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक ॥
(मानस ७/४१)

दूसरोंमें गुण है, उनको तो भले ही देखो, पर अवगुण मत देखो । अवगुण देखोगे तो वे अवगुण आपमें आ जायेंगे और अवगुण देखकर उनको उद्दण्डतासे बचानेके लिये क्रोध करते हो तो आप क्रोधसे नहीं बच सकते । इसलिये आप अपना कर्त्तव्यका पालन करो । दूसरोंका न कर्त्तव्य देखना है और न अवगुण देखना है । हाँ, लड़का है तो उसको अच्छी शिक्षा देना आपका कर्त्तव्य है, पर वह वैसा ही करे–यह आपका कर्त्तव्य नहीं है । यह तो उसका कर्त्तव्य है । उसको कर्त्तव्य बताना–यह आपका कर्त्तव्य नहीं है । आपको तो सिर्फ इतना ही है कि भाई, ऐसा करना ठीक नहीं है । अगर वह कहे–‘नहीं-नहीं बाबूजी, ऐसे करेंगे’; तो कह दो–‘अच्छा ऐसे करो !’ –यह बहुत बढ़िया दवाई है । मैं नहीं कहने योग्य एक बात कहा रहा हूँ कि ‘इस दवाईका मैं भी सेवन कर रहा हूँ ।’ आपको जो दवाई बताई, यह बहुत बढ़िया दवाई है । आप कहो–‘ऐसा करो’ और अगर वह कहे नहीं, हम तो ऐसा करेंगे । अच्छा, ठीक है, ऐसा करो ।

रज्जब रोस न कीजिये कोई कहे क्यूँ ही ।
हँसकर उत्तर दीजिये हाँ बाबाजी यूँ ही ॥

अन्याय हो, पाप हो तो उसको अपने स्वीकार नहीं करेंगे । अपने तो शास्त्रके अनुसार बात कह दी और वे नहीं मानते तो शास्त्र क्या कहता है ? क्या उनके साथ लड़ाई करो ! या उनपर रोब जमाओ ! आपको तो केवल कहनेका अधिकार है–‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ (गीता २/४७) और वे ऐसा ही मान लें–यह फल है, आपका अधिकार नहीं है । ‘मा फलेषु कदाचन’ (गीता २/४७) । आपने अपनी बारी निकाल दी, बस ! कर्त्तव्य तो आपका कहना ही था, उनसे वैसा करा लेना आपका कर्त्तव्य थोडा ही है ! वैसा करे, यह उनका कर्त्तव्य है । अपने तो कर्त्तव्य समझा देना है । उसने कर्त्तव्य-पालन कर लिया तो आपके कल्याणमें कोई बाधा नहीं और वह नहीं करेगा तो उसका नुकसान है, आपके तो नुकसान है नहीं, क्योंकि आपने तो हितकी बात कह दी । –यह बहुत मूल्यवान बात है !

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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